गणपतीची आरती

प्रकाशीत: 
(रानमेवा काव्यसंग्रहात प्रकाशित)
गणेश

गणपतीची आरती

जय गणेश, श्री गणेश, नमो श्रीगणेशा
आरती स्वीकार करा, वंदितो परेशा ॥धृ॥

वक्रतुंड,तिलकउटी, दंत कर्ण न्यारी
कमळ,शंख,फ़रशी करी, मूषावरी स्वारी
खंड तिन्ही मुकुटमणी, समर्था नरेशा ॥१॥

पर्णजुडी हरळीची, रुची मोदकाची
नारिकेल कलशाला, आम्र तोरणाची
रिद्धिसिद्धी पायावरी लोळती हमेशा ॥२॥

तूच बाप,माय तुचि, आम्ही तुझे लेक
एक आस जीवनास, पंथ दावी नेक
अभयहस्त पाठीवरी, ठेवुनि सर्वेशा ॥३॥

                                                   - गंगाधर मुटे
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(रानमेवा काव्यसंग्रह - प्रकाशन दि. १०.११.२०१०)

प्रतिक्रिया

संपादक's picture

सर्वच कविता छान आहेत .त्या नीट समजायला कवीच्याच कुवतीचा वाचक पाहिजे.एवढे मात्र मला समजले की स्वत:ला अभय म्हणविणारा हा कवी एक अग्निकुंड आहे ज्यात कोठेतरी क्रांतीचे बीज लपले आहे.

श्री बाबा यांचा या लिंकवरील प्रतिसाद

गंगाधर मुटे's picture

गणपती बप्पा मोरया !!! Smile

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Malubai's picture

आरती खुपच छान ,मला आवडली .

गंगाधर मुटे's picture

धन्यवाद मालुताई. Smile

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navnath pawar's picture

गंगाधरजी, गणपतीची आरती अपेक्षापूर्ती करत नाही,
पारंपारिक आरतीत अजून एक भर म्हणून ठीकच आहे..
पण आपला नेहमीचा टच नाही जाणवला....

Navnath Pawar
Aurangabad, Maharshtra

गंगाधर मुटे's picture

खरे आहे.
ही आरती फक्त भक्तीभावच व्यक्त करते.

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admin's picture

गणपती बप्पा मोरया !!!

admin's picture

गणपती बप्पा मोरया !!!

गंगाधर मुटे's picture

Aarti

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